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Gulzar Poem in Hindi – गुलज़ार कोबिता इन हिंदी गुलज़ार की नज़्मों से मिले 15 फ़लसफे

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ख़ुदा-1

बुरा लगा तो होगा ऐ ख़ुदा तुझे, दुआ में जब, जम्हाई ले रहा था मैं— दुआ के इस अमल से थक गया हूँ मैं! मैं जब से देख सुन रहा हूँ, तब से याद है मुझे, ख़ुदा जला बुझा रहा है रात दिन, ख़ुदा के हाथ मैं है सब बुरा भला— दुआ करो! अजीब सा अमल है ये ये एक फ़र्ज़ी गुफ़्तगू, और एकतर्फ़ा— एक ऐसे शख़्स से, ख़्याल जिसकी शक्ल है ख़्याल ही सबूत है।gulzar poem in hindi


ख़ुदा-2

मैं दीवार की इस जानिब हूँ! इस जानिब तो धूप भी है, हरियाली भी! ओस भी गिरती है पत्तों पर, आ जाये तो आलसी कोहरा, शाख़ पे बैठा घंटों ऊँघता रहता है। बारिश लम्बी तारों पर नटनी की तरह थिरकती, आँख से गुम हो जाती है, जो मौसम आता है, सारे रस देता है! लेकिन इस कच्ची दीवार की दूसरी जानिब, क्यों ऐसा सन्नाटा है कौन है जो आवाज़ नहीं करता लेकिन— दीवार से टेक लगाये बैठा रहता है।


ख़ुदा-3

पिछली बार मिला था जब मैं एक भयानक जंग में कुछ मसरूफ़ थे तुम नए नए हथियारों की रौनक़ से काफ़ी ख़ुश लगते थे इससे पहले अन्तुला में भूख से मरते बच्चों की लाशें दफ़्नाते देखा था और इक बार… एक और मुल्क में ज़लज़ला देखा कुछ शहरों के शहर गिरा के दूसरी जानिब लौट रहे थे तुम को फ़लक से आते भी देखा था मैंने आस पास के सय्यारों पर धूल उड़ाते कूद फलांग के दूसरी दुनियाओं की गर्दिश तोड़ ताड़ के गैलेक्सीज़ के महवर तुम जब भी ज़मीं पर आते हो भोंचाल चलाते और समन्दर खौलाते हो बड़े ‘इरैटिक’ से लगते हो काएनात में कैसे लोगों की सोहबत में रहते हो तुम। gulzar poem in hindi


ख़ुदा-4

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने— काले घर में सूरज रख के, तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे, मैंने एक चिराग़ जला कर, अपना रस्ता खोल लिया तुमने एक समन्दर हाथ में लेकर, मुझ पर ढ़ेल दिया मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया मेरी ख़ुदी को तुम ने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया— मौत की शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई मैंने जिस्म का ख़ोल उतार के सौंप दिया-और रूह बचा ली पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी



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Bappa Barman

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