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Gulzar Poems – गुलज़ार की 10 शानदार कविताएं!

gulzar poems मेरा ख़्याल है,नया मजमूआ लोगों के सामने पेश करने से पहले हर शायर को एक बार तो यह घबराहट ज़रूर होती होगी — पता नहीं, अब लोग क्या कहेंगे। इक्का दुक्का नज़्में लिखते रहने, और छप जाने से अपने पूरे काम का अन्दाज़ा नहीं हो पाता। जब धान की ढेरी लगती है तो पता चलता है कि पिछले साल में कितना मेंह बरसा, कितनी धूप खिली। बहुत से मौज़ू पिछले मजमूऐ से अलग हैं। कहीं नज्मों को पकने में देर लगी, कहीं मैं देर से पका। कहने का हौसला कम था।

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हर बार बाबा ने थपकी दी और हौसला अफ़ज़ाई की। मनू ने हाथ पकड़ा और आगे बढ़ा दिया। यह मजमूआ भी उसकी बदौलत तैयार हुआ है। मजमूऐ में एक बार फिर ‘त्रिवेणी’ शामिल है। त्रिवेणी ना तो मुसल्लस है, ना हाइकू, ना तीन मिसरों में कही एक नज़्म। इन तीनों ‘र्फ़ाम्ज़’ में एक ख़्याल और एक इमेज का तसलसुल मिलता है। लेकिन त्रिवेणी का फ़र्क़ इसके मिज़ाज का फ़र्क है। तीसरा मिसरा पहले दो मिसरों के मफ़हूम को कभी निखार gulzar poems

देता है, कभी इज़ाफ़ा करता है या उन पर ‘कॅमेंट’ करता है। त्रिवेणी नाम इस लिए दिया था कि संगम पर तीन नदियां मिलती हैं। गंगा, जमना और सरस्वती। गंगा और जमना के धारे सतह पर नज़र आते हैं लेकिन सरस्वती जो तक्षिला के रास्ते से बह कर आती थी, वह ज़मीन दोज़ हो चुकी है। त्रिवेणी के तीसरे मिसरे का काम सरस्वती दिखाना है जो पहले दो मिसरों में छुपी हुई है। उम्मीद भी है, घबराहट भी कि अब लोग क्या कहेंगे, और इससे बड़ा डर यह है कहीं ऐसा ना हो कि लोग कुछ भी ना कहें!! गुलज़ार

बोस्की-1

बोस्की ब्याहने का अब वक़्त क़रीब आने लगा है जिस्म से छूट रहा है कुछ कुछ रूह में डूब रहा है कुछ कुछ कुछ उदासी है, सुकूँ भी सुबह का वक़्त है पौ फटने का, या झुटपटा शाम का है मालूम नहीं यूं भी लगता है कि जो मोड़ भी अब आएगा वो किसी और तरफ़ मुड़ के चली जाएगी, उगते हुए सूरज की तरफ़ और मैं सीधा ही कुछ दूर अकेला जा कर शाम के दूसरे सूरज में समा जाऊंगा!

बोस्की-2

नाराज़ है मुझ से बोस्की शायद जिस्म का इक अंग चुप चुप सा है सूजे से लगते है पांव सोच में एक भंवर की आंख है घूम घूम कर देख रही है बोस्की, सूरज का टुकड़ा है मेरे ख़ून में रात और दिन घुलता रहता है वह क्या जाने, जब वो रूठे मेरी रगों में ख़ून की गर्दिश मद्‌धम पड़ने लगती है। 

काएनात-1

बस चन्द करोड़ों सालों में सूरज की आग बुझेगी जब और राख उड़ेगी सूरज से जब कोई चाँद न डूबेगा और कोई ज़मीं न उभरेगी तब ठंडा बुझा इक कोयला सा टुकड़ा ये ज़मीं का घूमेगा भटका भटका मद्‌धम ख़किसत्री रोशनी में! मैं सोचता हूँ उस वक़्त अगर काग़ज़ पे लिखी इक नज़्म कहीं उड़ते उड़ते सूरज में गिरे तो सूरज फिर से जलने लगे!!

काएनात-2

अपने “सन्तूरी” सितारे से अगर बात करुं तह-ब-तह छील के आफ़ाक़ की पर्तें कैसे पहुंचेगी मेरी बात ये अफ़लाक के उस पार भला? कम से कम “नूर की रफ़्तार” से भी जाए अगर एक सौ सदियां तो ख़ामोश ख़लाओं से गुज़रने में लगेंगी कोई माद्‌दा है मेरी बात में तो “नून” के नुक़्ते सी रह जाएगी “ब्लैक होल” गुज़र के क्या वो समझेगा? मै समझाऊंगा क्या? gulzar poems

काएनात-3

बहुत बौना है ये सूरज……! हमारी कहकशाँ की इस नवाही सी ‘गैलेक्सी’ में बहुत बौना सा ये सूरज जो रौशन है…. ये मेरी कुल हदों तक रौशनी पहुंचा नहीं पाता मैं मार्ज़ और जुपीटर से जब गुज़रता हूँ भंवर से, ब्लैक होलों के मुझे मिलते हैं रस्ते में सियह गिरदाब चकराते ही रहते हैं मसल के जुस्तजु के नंगे सहराओं में वापस फेंक देते हैं ज़मीं से इस तरह बांधा गया हूँ मैं गले से ग्रैविटी का दाएमी पट्टा नहीं खुलता!

काएनात-4

रात में जब भी मेरी आंख खुले नंगे पांव ही निकल जाता हूँ आसमानों से गुज़र जाता हूँ कहकशाँ छू के निकलती है जो इक पगडन्डी अपने पिछवाड़े के “सन्तूरी” सितारे की तरफ़ दूधिया तारों पे पांव रखता चलता रहता हूँ यही सोच के मैं कोई सय्यारा अगर जागता मिल जाए कहीं इक पड़ोसी की तरह पास बुला ले शायद और कहे आज की रात यहीं रह जाओ तुम ज़मीं पर हो अकेले मैं यहां तन्हा हूँ। gulzar poems



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Bappa Barman

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